हजरत सिर्री सकती रूहानी मदद हज पर जाना Hazrat Sirri Sakti Ruhani Hajj

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हजरत सिर्री सकती का रूहानी मदद से हज पर जाना Hazrat Sirri Sakti Ruhani Hajj

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एक दफा का वाक़्या है कि हज़रत सिर्री सकती ने फरमाया कि मैं एक रोज बैतुल मुकद्दस मे था और हज के दिनों मे बहुत थोड़े से दिन बाकी रह गये थे मैंने उस साल हज के लिये ना पहुंच सकने पर बड़ा अफसोस किया और दिल मे सोचने लगा कि मक्का मुआज्जमा और मदिना मुनव्वरा पहुंच चुके होंगे और मैं यहाँ हि हूँ अफसोस कि मैं इस नियामत से महरूम रह गया मैं रोने लगा और बहुत रोया थोड़ी देर के बाद हातिफ से एक निदा सुनी कोई कह रहा था अये सिर्री मत रों अल्लाह ताला तुम्हे किसी सबब मक्का मुआज्जमा पहुंचा देगा मैंने कहा मगर ये कैसे मुमकिन है जबकि मक्का मुआज्जमा यहाँ से काफी दूर है और मैं यहाँ बैतुल मुकद्दस मे हूँ आवाज आई कि अल्लाह के लिये सब कुछ मुमकिन है मैंने सजदा शुक्र अदा किया और हातिफ की आवाज की सदाकत के जहूर का इन्तेजार करने लगा इतने मे मस्जिद बैतुल मुकद्दस मे वज्या और नूरानी चहरे वाले चार हजरात दाखिल हुऐ उनकी नूरानी सूरते ऐसे पुरनूर थी कि जैसे सूरज चमक रहा हो उन चारो मेसे एक उनका पेशवा था और तीन उनके पीछे पीछे चल रहे थे ये लोग मस्जिद मे दाखिल हुऐ तो सारी मस्जिद जग मगा उठी मैंने उन्हें देखा तो उठकर उनके साथ हो लिया फिर उन्होंने दो रकात बा जमाअत नमाज पढ़ी इमाम वही बना जो उनका पेशवा था नमाज के बाद उनका वोह इमाम दुआ मागने लगा और वोह तीनो उसकी दुआ पर आमीन कहने लगे मैं करीब हो गया मैंने देखा कि वोह बड़ी रकत अमेज दुआ मांग रहे हैँ जब वोह दुआ से फारिग हुऐ तो मैं उनसे अस्सलामुअलैकुम कहा और उन्होंने जवाब दिया फिर उनके उसी पेशवा ने मुझसे कहा मुबारक बाद अये सिर्री कि हातिफ से तुम्हे हज की बसारत मिल चुकि है मैंने कहा हा या सय्यदी आपके यहाँ तशरीफ़ लाने से कब्ल मुझे हातिफ से ये बशारत मिली है वोह फरमाने लगे हाँ हाँ जब तुम्हे वोह निदाये हातिफ सुनाई गई है हम उस वक़्त खुरासान मे थे मैंने हैरान होकर पूछा हुजूर खुरासान की मुसाफत तो यहाँ से साल भरकी है फिर आप इतनी जल्दी यहाँ कैसे पहुंच गये तो फरमाया कि मुसाफत अगर हजारों साल की भी होतो कोई बात नहीं जमीन उसी खुदा की है जिसके हम बन्दे हैँ हम उसी की घरकी जियारत के लिये निकलते हैँ और पहुंचा देना भी उसी का काम है देखो ये सूरज मशरिक से चलकर सिर्फ एक दिन मे हि मगरिब मे पहुंच जाता है हालांकि मशरिक और मगरी की मुसाफत कई सालों की है तो किया सूरज इतनी तवील मुसाफत अपनी कुदरत से तैं करता है तो जब एक बेजान वजूद इतनी तबी मुसाफत दिन भर मे तैं कर लेता है तो जो अल्लाह के मकबूल बन्दे हैँ तो वोह अगर साल भर की मुसाफत पल भर मे तैं करलें तो कोनसी ताज्जुब की बात है फिर वोह बाहर निकले और मुझे साथ ले लिया और नमाजे जुहर तक हम एक ऐसी जघा पहुचे जहाँ पानी का नाम वा निशान तक ना था मगर उसी मकबूल हक की बरकत वा करामत से हमने वहाँ एक ठंडा चस्मा पाया जिससे हमने वुजू किया और नमाज पढ़ी फिर चले और नमाजे असर के वक़्त हमें हजाज की निशानिया नजर आने लगी और मगरिब से पहले पहले हम मक्का मुअज्जमा पहुंच गये, मक्कामुअज्जमा पहुंच कर वोह लोग पाक मेरी नजरों से गायब हो गए

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Thanks for reading: हजरत सिर्री सकती रूहानी मदद हज पर जाना Hazrat Sirri Sakti Ruhani Hajj, Sorry, my Hindi is bad:)

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