एक बूढ़े की तौबा का किस्सा गौस पाक

एक बूढ़े की तौबा का किस्सा गौस पाक
Sakoonedil

 एक बूढ़े की तौबा का किस्सा गौस पाक 

एक बूढ़े की तौबा का किस्सा गौस पाक


हजरत अब्दुल कादिर जीलानी एक रोज सब्र वा इस्तेकामत और ऐसार के मौजू पर हाजरीने मजलिश को दर्स दे रहे थे कि अचानक खामोशी इख़्तियार करली हाजरीन हैरत मे पड़ गये कि इलाही माजरा किया है फिर अगले ही लम्हे आपने आसमान की तरफ उगली उठाई और हाजरीन से मुख़ातिब होते हुऐ फरमाया कि सिर्फ सौ दीनार दरकार हैँ आपका इरशाद सुन्ना था कि बेशुमार लोग सौ सौ दिनारों की थैलिया लेकर आपकी खिदमत मे हाजिर हो गये मगर आपने सिर्फ एक शख्स से सौ दीनार कबूल किये



 और एक ख़ादिम को हुकुम दिया कि ये रकम लेकर फला जघा जाओ वहाँ तुम्हें एक बूढ़ा शख्स बरबत बजाता हुआ नजर आएगा उसे ये दीनार देकर वापिस चले आना ख़ादिम आपका हुकुम बजा लाया और फौरन मकबरह सौनेजा पर पहुंच गया जहाँ सच मुच एक बूढ़ा बरबत बजा रहा था ख़ादिम ने सौ दीनार उसकी हथेली पर रख दिये मगर बूढ़ा एक जोरदार चीख मारकर बेहोश हो गया जब दुबारा होश मे आया तो ख़ादिम ने उसे बताया कि शैख़ अब्दुल कादिर जीलानी ने तुझे याद फरमाया है बूढ़ा फौरन उसके साथ हो लिया जब दोनों हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की खिदमत मे हाजिर हुऐ तो आपने बूढ़े से फरमाया कि वोह अपना किस्सा बयान करे,



बूढ़ा बोला कि आये हजरत मैं आलमे शबाब मे निहायत उम्दा गाया बजाया करता था मुझे बरबत नवाजी पर कमाल हासिल था लोग मेरी आवाज के शैदाई थे मगर जब मैं बुढ़ापे की दहलीज पर दाखिल हुआ तो मेरी कबूलियत मे कमी आगई मैंने दिल सिकस्ता होकर फैसला किया कि अब सिर्फ मुर्दा लोगों को अपना गाना सुनाया करूँगा इस लिये मैंने शहर खामोसा मे सकुनत इख़्तियार करली और वही पर गाने बजाने लगा एक रोज मैं रोज की तरह वहाँ गाने बजाने मे मसरूफ था कि अचानक एक क़ब्र से आवाज़ आई कि आये शख्स तू कबतक मरे हुऐ लोगों को अपना नगमा सुनाता रहेगा अब तो अपने अल्लाह की जानिब रुजु कर



 ये सुनकर मेरे ऊपर शख्त खौफ और लर्जा तारी हो गाया और मैं आलमे बे खुदी मे कुछ इस किस्म के शायरी पढ़ने लगा आये मेरे रब मेरे पास यौमे हश्र के लिये कोई सरमाया नहीं है सिवाये इसके कि मेरे दिल मे तेरी रेहमत वा बख्शिश की उम्मीद हो मेरा बुढ़ापा रोजे महसर तेरी बारगाह मे मेरी शफाअत करेगा मैं उम्मीद करता हूँ कि तू इसपर नजर करके मुझे अपने दामने रहमत मे जघा अता फरमायेगा ये वाक़्या सुनाने के बाद बूढ़ा हजरत अब्दुल कादिर जीलानी से दुबारह मुख़ातिब हुआ हुजूर ये शायरी मेरी जुबान पर थे कि आपके ख़ादिम ने आकर मेरी हथेली पर सौ दीनार रख दिये अब मैं गाने बजाने से तौबा करता हूँ और अपने खुदा की तरफ रुजु करता हूँ ये कहकर बूढ़े ने अपना बरबत उसी वक़्त तोड़ फोड़ दिया,,,

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Thanks for reading: एक बूढ़े की तौबा का किस्सा गौस पाक , Sorry, my Hindi is bad:)

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