शैख़ अबु अली के कलाम मे गहराई
जिंदगी के आखरी वक़्त मे आपकी ये कैफियत हो गई थी कि शाम के वक़्त अपने बाला खाने पर मौजूद आपके मजार के नजदीक और इस वक़्त बैतुल मफ़तूह के नाम से मशहूर है आफ़ताब के जानिब मुँह फेर कर फरमाया करते थे कि आये ममलकतो मे गर्दिश करने वाले आज तेरी किया हालत होती जा रही है और मुल्क अल मौत के गिर्द तूने किस तरह गर्दिश की और ये बता दे किया तूने किसी जघा मुझ जैसा शैदाई और इश्तीयाके दीद रखने वाला भी देखा है गर्ज आप गुरुब आफ़ताब के वक़्त तक इसी किसिम की बातें करते रहते थे आखरी दौर मे आपका कलाम इस कदर जो माना और दक़ीक़ होने लगा था कि लोग उसका मतलब समझने से क़ासिर रह जाते थे इसके बा अस आपके मजलिस मे आखरी दिनों मे शिरकत करने वाले लोगों की तादाद 14 पंद्रह लोग से ज़ियादा ना होती थी हजरत अंसारी का कौल है कि जब आपका कलाम बहुत गहरा और बुलंद हो गया था तो आप की महफ़िल मखलूक से खाली नजर आने लगी थी
दुआ की अदम कबूलियत की वजा
एक दफा का वाक़्या है कि लोगों ने आपसे दुआ कि अदम कबूलियत का शिकवा किया तो हजरत ने उसने कहा कि तुम लोग अल्लाह को पहचानते हुऐ भी उसकी इताअत से गुरेजा हो और उसके क़ुरआन वा रसूल और उसके एहकाम पर अमल नहीं करते जियदातर ना नुशरे रहते हो बहिस्त मे जाने और दोजख से बचाव के लिये कुछ नहीं करते तुम लोग अपने वाल्देन सुपुर्द खाक करने के बावजूद भी इबरत नहीं पकड़ते शैतान को अपना दुश्मन जानने के बावजूद उसको लानत मलामत नहीं करते बल्कि उसको अपना दोस्त रखते हो आपने लोगों से मजीद कहा कि तुम मौत पर यकीन रखने के बावजूद उससे बेखबर और ला परवाह हो और अपने अइबो से वाकिफ होने के बावजूद दूसरों की ऐब जोई मे मशरूफ रहते हो लेहाजा इस मुनाफकाना फिजा मे तुम्हारी दुआएँ खुदा की दरबार मे भला किस तरह सरफे कबूलियत हासिल कर सकती हैँ,,,
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Thanks for reading: शैख़ अबु अली के कलाम मे गहराई, Sorry, my Hindi is bad:)