हजरत शम्स तबरेजी और मौलाना रूम की मुलाक़ात

हजरत शम्स तबरेजी और मौलाना रूम की मुलाक़ात islamic waqya hindi stories
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 हजरत शम्स तबरेजी और मौलाना रूम की मुलाक़ात

हजरत शम्स तबरेजी और मौलाना रूम की मुलाक़ात


मौलाना रूमी की जाह व जलाल की हैबत सारे कलम रोही पर थी बादशाह आपका खुद एहतराम करते थे आलिशान मकान दरवाजे पर पहरेदार राहत व अशाइश का हर सामान मयस्सर था मौलाना रूमी के शायाने शान आपकी एक अजीमुशशान लायब्रेरी थी जिसमे नादिर व नायाब किताब का एक बहुत बड़ा जखीरा था हजरत शम्स तबरेजी मकान पर पहुचे तो मौलाना रायब्रेरी मे मौजूद थे आपने उनको वही बुलवाया मौलाना फलसफे की एक ऐसी किताब मुलाखत फरमा रहे थे जिसका नुशखा सिर्फ उन्हीं की लायब्रेरी मे मौजूद था मुतालआ की महूयत और दिल चसबी इतनी बढ़ी हुई थी कि आने वाले महमान को रस्मी तौर पर खुश आमदीद कहने के बाद हजरत मौलाना फिर किताब देखने मे गुम हो गये जब मौलाना रूमी किसी जरुरत की वजा से कमरे से बहर गये तो हजरत तबरेजी ने फलसफे की वही किताब उठाई और मकान की हौज मे डाल दी,


मौलाना वापिस तसरीफ लाये तो उसी किताब का ख्याल था देखा तो किताब मौजूद नहीं थी इधर उधर तलाश किया लेकिन जितना वक़्त गुजरता जाता था मौलाना की परेशानी बढ़ती जाती थी आखिर हजरत शम्स तबरेजी ने पूछा और मौलाना ने अपनी परेशानी का सबब बताया तो हजरत शम्स ने बहुत इतमेनान और सुकून से फरमाया वोह किताब तो मैंने हौज मे डाल दी है मौलाना बहुत नाराज हुऐ और उस किताब की एहमियत के पेशे नजर शख्त बातें की हजरत ने फरमाया इसमें खफा होने और अफसोस करने की कौनसी बात है अगर वोह किताब तुम्हें बेहद पसंद है तो आओँ मंगवा देते हैँ हजरत मौलाना रूमी बेहद हसे कि पानी से भरे हुऐ हौज मे नायाब कलमी किताब का यूँ फैक देना ही कितनी बड़ी खिलाफे अक्ल व होश बात थी और अब दूसरी ये बात उससे भी खिलाफे दानिस ये कह रहे हैँ कि आओँ किताब ले आये,


हजरत शम्स तबरेजी ने फरमाया तुम अपने इल्म के मुताबिक ठीक ही कहते हो लेकिन तुम्हारा इसमें नुकसान भी किया है तुम्हारे नजदीक तो किताब खतम हो चुकि है तलाश कर लेने मे हर्ज किया है मौलाना रूमी राजी हो गये और हजरत उनको लेकर हौज पर पहुचे और आपने हौज की मछलियों को खताब करके फरमाया कि आओँ हमारे मौलवी की किताब लादो कुछ ही देर के बाद कुछ मछलीया यूहीँ तैरती हुई सामने आकर रुक गई लेकिन उनमे से एक मछली आई जिसमे मुँह मे वही नायाब किताब थी और उसने हौज के किनारे पर वोह किताब छोड़ दी हजरत तबरेजी मुस्कुरा रहे थे और हजरत मौलाना हैरत से खामोशी का मुजस्समा बन गये थे हजरत तबरेजी ने किताब उठाकर मौलाना के हवाले की जब उन्होंने देखा की पानी की तह मे पड़ी हुई किताब जब हौज से बाहर आई तो उसपर पानी का एक कतरा भी ना था मौलाना रूमी इस वाक़्या से बेहद मुतास्सिर हुऐ और आखिर इस एक मंजर ने उनके दिल की दुनियां ही बदल दी,,,

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Thanks for reading: हजरत शम्स तबरेजी और मौलाना रूम की मुलाक़ात, Sorry, my Hindi is bad:)

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